मुंबई की लोकल ट्रेनों मैं सफ़र का तजुर्बा सालो रहा है ,आज कुछ ऐसा अखबार मैं पढ़ लिया की दिल चाहा आप सब से कुछ कह डालूं. मुंबई लोकल ट्रेन म...

आप भी सोंच रहे होंगे यह चौथी सीट है क्या मुसीबत. भाई यह हिन्दुस्तान के नागरिकों के भाईचारे की , इंसानियत की पहचान है. जो प्रथम श्रेणी के कोच मैं सफ़र करने वालों मैं ख़त्म होता जा रहा है. तीन सीट तक बैठने की जगह एक बर्थ मैं हुआ करती है. यदि तीनो लोग ज़रा ज़रा सा सिमट के बैठ जाएं तो चौथी सीट या आधी सीट और बैठने के लिए निकल आया करती है, है ना इंसानियत और भाईचारे की मिसाल?

आगे जा के ट्रेन मैं धीरे धीरे भीड़ बढती जाती है और ३-४ स्टेशन बाद तो यह भी नहीं पता लगता की आपकी शर्ट बाहर है या अंदर, यह भी पता नहीं लगता की कौन किसको कहां धक्के मार रहा है, . लोग धक्का लगने पे कुछ बोलते नहीं बस हिल के रह जाते हैं, आदत सी पड चुकी होती है..
मुंबई लोकल ट्रेन मैं झगडे भी एक आम सी बात है, कभी कोई घर मैं लड़ के आया होता है तो ट्रेन मैं गुस्सा निकालता है और कभी कोई बॉस की डांट खा के आया होता है तो ट्रेन मैं सभी को डांट के बॉस बनने का नाटक करता है. अधिकतर झगडे, या तो चौथी सीट के लिए, या खड़े होने पे धक्के लगने के कारण या गेट पे ,चढ़ने की जगह घेर के खड़े लोगों के कारण हुआ करते हैं..इतनी बड़ी भीड़ मैं और वोह भी ९८% रोज़ी रोटी के लिए जाने वाले मुसाफिरों मैं चिडचिडापन एक आम सी बात है, इसलिए ऐसे बेबुनियाद झगड़ों मैं बर्दाश्त करके बात ना बढ़ने दी जाए यही बेहतर होता है..

ट्रेन की चैन खींच के देखा जो बच्ची का सर फट गया था, पैर और हाथ मैं फ्रक्चर हो गया था लेकिन जीवित थी और अभी अस्पताल मैं है. ऐसा लगता है की १९ साल के नौजवान ने झगडे और जोश के कारण ऐसा कर दिया हो, और यकीनन यह एक इंसानियत सी भी अधिक गिरा हुआ काम किया उसने और पकड़ा भी गया.
सब से अहम् बात जो मैंने उस खबर मैं देखी वोह यह की " उस बच्ची के बाप ने कहा उसको यदि मालूम होता की यह झगडा उसकी बच्ची के लिए इतना मंहगा पड़ेगा तो वोह खड़ा खड़ा ही सफ़र कर लेता बैठने की जगह ना मांगता." ग़लती हकीकत मैं उस १९ साल के नौजवान की थी फिर भी उस बच्ची का बाप बहुत गहरी बात बात कह गया. झगड़ों से सब्र करके, थोड़ी तकलीफ उठा के, ज़रा सा छोटा बन के , बड़ी तकलीफों से बचा जा सकता है.
आज मानवाधिकार के मौके पर यह कह देना भी आवश्यक समझता हूँ की मुंबई मैं ट्रेन से सफ़र करने वाले लोग जानवरों से बुरी हालत मैं ट्रेन से रोजाना आने जाने को मजबूर हैं. इसका ज़िम्मेदार कौन?
…स.म.मासूम
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