हर इंसान इस समाज मैं शांति से जीना चाहता हैं, फिर भी समाज मैं अशांति देखने को मिलती है , क्यों? धर्म कोई भी हो समाज मैं अमन शांति, प्रे...

एक समय था जब अगर कोई साधू या मौलवी होता था तो समाज उसको इज्ज़त की नजर से देखता था. धर्म की बातें करने वाला,धार्मिक उपदेश देने वाला, शांति दूत लगता था. आज धर्म की बातें करने वाला नफरत का सौदागर और ढोंगी नजर आता है. हमारी सोंच मैं यह बदलाव क्यों आया ध्यान देने योग्य है. क्या हम सच मैं भूल चुके हैं की भक्ति किसे कहते हैं?
जैसा की मैं समझता हूँ की इसका एक कारण तो यह है की आदमी धर्म की बातें तो बहुत करता है पर जब उन्हें आचरण में उतारने की स्थिति आती है तो वह प्राय: फिसल जाता है। हमारे धर्म के सिद्धांत कुछ और कहते हैं और हमारा जीवन कुछ और हो जाता है। और दूसरा कारण है हमारी धार्मिक संवेदनशीलता लगातार बढ़ते जाना, जिसका फाएदा, राजनीतिक पार्टी और कट्टरवादी धार्मिक लोग आज ले रहे हैं.
विश्व में जितने भी भगवान के अवतार या उनके संदेश वाहक हुए हैं उनके चरित्र विश्व भर में प्रचारित हैं, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का आकर्षण हम सब महसूस कर सकते हैं, इसी लिए यह लोग आदरणीय और पूजनीय हैं. लेकिन देखिये इन्ही भगवान के अवतार या उनके संदेश वाहकों के नाम का इस्तेमाल कैसे राजनीतिज्ञ करते हैं और हम परमात्मा के सन्देश वाहकों की जगह इन ढोंगी नेताओं के पीछे-पीछे चलने लगते हैं.
ओबामा , इस नाम को सब जानते हैं. जब राष्ट्रपति इलेक्शन हो रहा था तो ,हर दूसरे दिन ख़बरों मैं आता था , ओबामा मुसलमान है, इमाम हुसैन (अ.स) के कथन तक इन जनाब से जोड़ के ,लेख़ लिखे और लिखवाए गए. मुसलमान पागलों की तरह ओबामा के हक मैं बात करता था. ऐसा लगता था ओमाबा जीत के आते ही सारा अमेरिका इनको ही दे देगा. आज यही ओबामा इस्लाम विरोधी राष्ट्रपति की शक्ल मैं पहचाना जाता है.
उसी समय यह भी खबर सुनने मैं आयी की अमेरिका में राष्ट्रपति पद उम्मीदवार ओबामा अपनी जेब में रखने वाले पर्स में कुछ पवित्र प्रतीक रखते हैं और उसमें सभवतः हनुमान जी की मूर्ति भी है. “हनुमान भक्त ओबामा”, “ओबामा करते हैं हनुमान जी में विश्वास” तथा “हनुमान जी की मूति ओबामा के पर्स में”आदि आदि, तरह की खबरें बग़ैर पुष्टि के आने लगीं. ऐसा लगा की हनुमान जी वाकई कृपा करते हैं, इस बात की सत्यता केवल ओबामा के जेब मैं हनुमान जी की मूर्ति की तस्वीर रख लेने से ही साबित होती है.
अगर मान लीजिये ओबामा हनुमान जी में विश्वास रखते भी हैं तो क्या खास बात है? और नहीं भी करें तो क्या? और अगर ओबामा का नाम हुसैन है तो क्या और नहीं है तो क्या?
राष्ट्रपति पद उम्मीदवार , या हिंदुस्तान की किसी पार्टी के किसी भी नेता ,का जब हम चुनाव करते हैं तो यह देखना चहिये, की उसका ज्ञान कितना है, उसका व्यक्तित्व और चरित्र कैसा है.वोह देश के हित मैं काम करेगा अथवा नहीं? कहीं वोह व्यभिचार, कालाबाजारी मैं लिप्त, तो नहीं? होता इस से अलग है. आज यह देखा जाता है, की यह वो किस धर्म है? या किस धर्म के लोगों से अपने भाषणों मैं सहानभूति दिखाता है?
ओबामा को भी इन अफवाहों का फाएदा मिला और हिंदुस्तान मैं भी सभी नेता इसका फाएदा संचार-माध्यम का बखूबी इस्तेमाल करके लेते रहे हैं और नुकसान मैं आम इंसान ही रहा है , जो इनको चुन के लाता है, और सबसे अधिक ताक़तवर है.
नफरत के सौदागर ,धर्म के नाम पे , समय समय पे, दंगे फसाद , बोंम्ब ब्लास्ट करवा तो लेते हैं, हजारों बेगुनाहों की जान जाने का कारण तो बन जाते हैं लेकिन आशा की किरण आज भी दिखाई देती है, जम हम इस हिन्दुस्तान मैं हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई सबको एक साथ अच्छे पडोसिओं की तरह रहते देखते हैं.
शायद अधिकतर लोग आज भी इस बात पे विश्वास रखते हैं, की हम इंसान पहले हैं , हिन्दू या मुसलमान बाद मैं हैं.